शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

फिर पंद्रह अगस्त मनाओ-कविता

फिर पन्द्रह अगस्त मनाओ

लो फिर आया  स्वतंत्रता का एहसास दिलाने 
अगस्त का पन्द्रहवा दिवस 
पर मानव मन मेरा पुलकित हुआ नहीं 
कुछ उफनती सी कुछ अनदेखी सी 
उभरती रही सिसक। 
आकांशाये सब मर मिटी 
स्वपन सब फूल से झर गए 
पंछी का मुक्त आकाश में 
विचरण करना अब संभव नहीं 
क्योंकि अब समय की तेज धार से 
उसके पंख कट गए। 
आओ तुम मेरे साथ आओ 
शंख ध्वनि ध्वनि करो अलख जगाओ 
मानव के सुशुप्त मन में चेतना जगाओ 
 और पन्द्रह अगस्त मनाओ।







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