* दायरा *
अतीत के दायरे से निकल
वर्तमान की कठोर धरती पर
जब मैं विचरण करता हूँ
तो सोचता हूँ ,कि आदमी
आदम से आदमी हो गया है।
पर जब वर्तमान की कठोरधरती से उठ
भविष्य की कल्पना में उड़ान भरता हूँ
तो सोचता हूँ ,कहीं आदमी
आदमी से आदम न हो जाय।
अतीत के दायरे से निकल
वर्तमान की कठोर धरती पर
जब मैं विचरण करता हूँ
तो सोचता हूँ ,कि आदमी
आदम से आदमी हो गया है।
पर जब वर्तमान की कठोरधरती से उठ
भविष्य की कल्पना में उड़ान भरता हूँ
तो सोचता हूँ ,कहीं आदमी
आदमी से आदम न हो जाय।
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