रविवार, 9 जून 2024

कविता -- मंजिल

 बीच राह में क्यों अड़ा हुआ,

 क्यों गुमसुम सा खड़ा हुआ।

सोचेगा तो रोशनी मिल ही जायेगी,

 चलते-चलते मंजिल मिल ही जायेगी।

पतझड़ आता है तो आने दो,

 पत्ते गिरते हैं तो गिरने दो।

 फूल गिरे पर कली खिल ही जायेगी,

 चलते-चलते मंजिल मिल ही जायेगी। 

घबराना नहीं किसी भी मोड़ पर,

नहीं पहुंचा है अभी धरती के छोर पर।

 धैर्य और हिम्मत से दिशा दिख ही जायेगी 

  चलते चलते मंजिल मिल ही जायेगी।

होश कभी भी न खोना,

 निराशा कभी भी न होना।

 दृढ़ निश्चय से हिम्मत मिल ही जायेगी,

 चलते चलते मंजिल मिल ही जायेगी।

Mssa