रविवार, 6 जून 2021

लॉक डाउन के बाद की कविता

 लॉक वाले पीरियड में

 हम हो गए थे डाउन,

 यह बात दीगर है कि

 घर में रहते रहते 

हो गए थे ब्लैक से ब्राउन।

 लॉक खुला तो प्लान बना

  जाने का बाजार ,

 क्योंकि लाना था हमें

  साबुन चप्पल और अचार।

 किराना वाला बोला 

 आइटम कौन से वाले लेने हैं , 

 हम बोले अब नया क्या है

  हमेशा वाले ही लेने हैं ।

 वह बोला सादा वाले ही दूं 

 या इम्यूनिटी वाले ,

 मैंने कहा छोड़ कम्युनिटी वाले

  और दे दे इम्युनिटी वाले। 


 सामान लेकर हम पहुंचे 

 चप्पल की दुकान में ,

 हमें देख खुशी छलक उठी

  दुकानदार की मुस्कान में ।

 हमने बोला चप्पल दिखाओ 

 वह बोला  जनाब कैसी,

हमने सीधा सा जवाब दिया

 जनाब अच्छी हो वैसी ।

  वह बोला सादा या इम्यूनिटी वाली     

        मैने पूछा दोनों में क्या है अंतर ,

  वह बोला एक तो है पहले जैसी 

    दूसरी में है इम्यूनिटी बूस्टर ।

  मैं बोला छोड़ कम्युनिटी वाली ,

 और दे दे इम्यूनिटी वाली ।


 तभी हमारा फोन घन-घनाया , 

 हमने उसे उठाया  कान से लगाया, 

 आवाज आई उधर से 

 मैं तुम्हारा दोस्त शर्मा बोल रहा हूं    

   मैंने कहा इधर से मैं

 एस के गुप्ता बोल रहा हूं ।

 बोले बहुत दिन हो गए नहीं मिले, 

 मिलेंगे तो दूर करेंगे शिकवे गिले।

  आ जाओ मैं स्वर्ण पथ पर खड़ा हूं, 

 मैंने कहा मैं कौन सा घर पर पड़ा हूं। 

 आप स्वर्ण पथ पर तो मैं 

थोड़ा कम  रजत पथ पर खड़ा हूं।

  आ जाओ पानी पुरी खाएंगे ,

 लेकिन पैसे अपने-अपने चुकाएंगे।

 श्रीमती जी रह गई खड़ी की खड़ी 

जब उनकी निगाह पानीपुरी के ठेले पर पड़ी।

  हमने कहा एक प्लेट ही देना 

थोड़ा वह थोड़ा मैं खा लूं ,

 वह बोला अंकल जी पूरी में 

 पानी कौन सा डालूँ। 

 मैंने कहा भाई आज

  बात क्या निराली है , 

 वह बोला दूसरे में 

 रामदेव की कोरोनिल डाली है ।

 यहां भी हमने कहा  

छोड़ कम्युनिसटी वाली,

 और देदे इम्यूनिटी वाली ।


 फिर अपने मित्र को फोन लगाया 

 लेकिन उधर से आवाज आई

  मैं अमिताभ चच्चन बोल रहा हूं,

 मैंने तुरंत बोल तो दिया 

मैं एस के गुप्ता बोल रहा हूं।

  फिर सोचा यह क्या है लफड़ा, 

  चच्चन को मुझसे 

 क्या काम आ पड़ा।

  शायद करोड़पति से 

 जो करोड़ों कमाए ,

 वे सब कोरोना के 

 इलाज में गंवाये।

  अब यह मुझसे पैसे मांगेगा,

  मांग लिया तो कैसे मना कर पाऊंगा,

  मेहता जी से लूंगा तभी तो दे पाऊंगा।

 मेहता जी को मैंने अपनी व्यथा सुनाई ,

 उन्होंने तुरंत फोन लगाया 

 और दिलासा दिलाई। 

बोले इनसे बात करो,

 थोड़ी सी फरियाद करो ।

 उधर से आवाज आई  

मैं मुकेश बम्बानी बोल रहा हूं 

 मैंने कहा श्रीमान आपसे 

 काम है मुझे थोड़ा ,

 सुनते ही वे  बोले आप मुझे 

 शर्मिंदा कर रहे हो बड़ा।

  मैंने तो खुद ही पब्लिक से 

सौ सौ, दो दो सौ लिया है,

  और उससे ही अपना 

 साम्राज्य खड़ा किया है।

  तभी फोन का बाजा बजा  

  भार्गव जी का नाम दिखा

  बोले गुप्ता जी स्वर्ण पथ पर

  क्या कर रहे थे ,

  हमने कहा इम्युनिटी वाला

  सामान परचेज कर रहे थे।

  वे बोले यह सब छोड़ो,

  और मुझ से नाता जोड़ो। 

 मेरे पास एक बहुत अच्छी

  इम्यूनिटी वाली कविता है,

  वह आपको सुनाऊंगा

 और आपकी इम्यूनिटी बढाऊंगा। 

 मैंने कहा जो आपने कविता बनाई 

   वह क्या घरवालों को भी सुनाई ,

 बोले घरवाले तो कहाँ गुनते हैं 

 इसीलिए कविता नहीं सुनते हैं ।

वे तो कविता सुन झल्लाते हैं 

इसलिए कवि सम्मेलन में जाकर चिल्लाते हैं।


"छोड़ो कम्युनिटी वाली और 

 दे दो इम्यूनिटी वाली"

 अबकी बार मैंने यह नहीं कहा

 मैंने कहा कि अब तो 

 कोरोना की वैक्सीन आ गई है 

  तो वैक्सिंग लगवाऊंगा ,

और  कोरोना को दूर भगाऊंगा।

आजा , बसंत आजा

*आजा बसंत आजा*

 नव बहार,नव सृजन,लिए जैसे ही,

 होता है बसंत ऋतु का आगमन।

 खिल जाता है हर चेहरा,

 खिल जाता है हर मन-उपवन।


पीली-पीली सरसों ऐसी खिले खेतों में,

पीत चुनर ओढ़ खड़ी हो जैसे दुल्हनियां।

सुषुप्त मन, शिथिल तन, उत्साहित हों,

हर घर आंगन में भर जाएं खुशियां।


 लेकिन ए बसंत, क्यों है तू सिर्फ,

फूल , पत्ती और पेड़ों पर मेहरबां।

कुछ मुरझाए से मानव भी ,

 टकटकी लगाए बैठे हैं यहां ।


कुछ तो , हां कुछ तो तरस खा,

 बसंत आजा , दे जा दिलासा।

  ज्यादा नहीं तो किंचित ही,

 मुरझाए से चेहरों को खिला जा।  

     आजा बसंत आजा ,

     आजा बसंत आजा।

स्वरचित  एवं मौलिक -

सतीश गुप्ता पोरवाल,मानसरोवर ,जयपुर।



मकर सक्रांति

 आओ मनायें मकर सक्रांति ,

 सर्वत्र हो शांति ही शांति।

 मीठा-मीठा मीठा सा है यह त्योहार,

 अच्छा हो सबका परस्पर व्यवहार।

 तिल और गुड़ के बनायें लड्डू ,

 खायें तानी,तनिश दीया और बिट्टू।                'तिलगुल घ्या गोड गोड बोला',

 लगे जैसे वाणी में मिश्री को घोला।                       सभी लायें पतंग और डोर,

 उड़ी धरती से बादलों की ओर।

  ये पतंगे सभी को दें संदेशा,

 सुख और शांति रहे हमेशा।

नव वर्ष का अभिनंदन

 🏵️ नव वर्ष का अभिनंदन 🏵️   

   गत को करें नमन ,

 आगत का अभिनंदन ।

  साथ रहे हैं कुछ अपने ,

 कुछ अपने भी हुए पराये।

  दूरी क्यों है हमसे ,

अब तक समझ न पाये। 

 फिर भी हम ह्रदय से 

करते हैं सबको वंदन,

  गत को नमन ,

 आगत का अभिनंदन ।


  विधाता जो था दयालु ,

 क्यो हो चला था क्रूर ।

 छीन ले गया अपनों को,

 अपनों से बहुत ही दूर ।

फिर भी नव आशा को 

 ताक रहे सबके नयन,

  गत को करें नमन ,

 आगत का अभिनंदन ।


छोड़-छाड़ सब द्वेष-विद्वेष 

 नव निर्माण का आगाज करें,

  मन का मैल मिटाकर 

झंकृत मन का साज करें ।

 काम करें सब मिलकर ऐसा

 जीवन वन बन जाए उपवन,

 गत को करें नमन ,

 आगत का अभिनंदन।

सांता आया

 सांता आया सांता आया,

 भर गठरी में खुशियां लाया।

  घर आंगन सब साफ कराते ,

 क्रिसमस ट्री को खूब सजाते। 

  मम्मी पापा बाजार जाते,

 हम सब के कपड़े हैं लाते।

  आओ मनाएं हम सब क्रिसमस,

  खुशियों में रम जाएं हम सब ।

  हम सबको भाता है सांता,

  हम सबके मन को है भाता।

  सांता आया सांता आया ,

  भर गठरी में खुशियां लाया ।