रविवार, 6 जून 2021

आजा , बसंत आजा

*आजा बसंत आजा*

 नव बहार,नव सृजन,लिए जैसे ही,

 होता है बसंत ऋतु का आगमन।

 खिल जाता है हर चेहरा,

 खिल जाता है हर मन-उपवन।


पीली-पीली सरसों ऐसी खिले खेतों में,

पीत चुनर ओढ़ खड़ी हो जैसे दुल्हनियां।

सुषुप्त मन, शिथिल तन, उत्साहित हों,

हर घर आंगन में भर जाएं खुशियां।


 लेकिन ए बसंत, क्यों है तू सिर्फ,

फूल , पत्ती और पेड़ों पर मेहरबां।

कुछ मुरझाए से मानव भी ,

 टकटकी लगाए बैठे हैं यहां ।


कुछ तो , हां कुछ तो तरस खा,

 बसंत आजा , दे जा दिलासा।

  ज्यादा नहीं तो किंचित ही,

 मुरझाए से चेहरों को खिला जा।  

     आजा बसंत आजा ,

     आजा बसंत आजा।

स्वरचित  एवं मौलिक -

सतीश गुप्ता पोरवाल,मानसरोवर ,जयपुर।



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