*आजा बसंत आजा*
नव बहार,नव सृजन,लिए जैसे ही,
होता है बसंत ऋतु का आगमन।
खिल जाता है हर चेहरा,
खिल जाता है हर मन-उपवन।
पीली-पीली सरसों ऐसी खिले खेतों में,
पीत चुनर ओढ़ खड़ी हो जैसे दुल्हनियां।
सुषुप्त मन, शिथिल तन, उत्साहित हों,
हर घर आंगन में भर जाएं खुशियां।
लेकिन ए बसंत, क्यों है तू सिर्फ,
फूल , पत्ती और पेड़ों पर मेहरबां।
कुछ मुरझाए से मानव भी ,
टकटकी लगाए बैठे हैं यहां ।
कुछ तो , हां कुछ तो तरस खा,
बसंत आजा , दे जा दिलासा।
ज्यादा नहीं तो किंचित ही,
मुरझाए से चेहरों को खिला जा।
आजा बसंत आजा ,
आजा बसंत आजा।
स्वरचित एवं मौलिक -
सतीश गुप्ता पोरवाल,मानसरोवर ,जयपुर।
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