गुरुवार, 27 अगस्त 2015

आखिर क्यों नहीं मिलता - बुजुर्गों को उचित सम्मान

बड़ी कोफ्त होती है , दिल में गहरी टीस उठती है , उदासी छा जाती है मन पर- यह सोचते हुए कि आखिर आज के जमाने में , बुजुर्गों को वह यथोचित सम्मान क्यों नहीं मिल पाता , जिसके कि वे हकदार हैं । जन्म से युवा होने तक जो मां-बाप अपरिहार्य होते थे वे अब परिहार्य कैसे हो गए हैं । कहा यही जाता है कि बचपन व युवा अवस्था, चाहे कैसी भी गुजरे ,लेकिन वृद्धावस्था, किसी भी व्यक्ति की ,सुख व शांति से गुजरनी चाहिए । लेकिन कई बुजुर्गों के साथ एेसा नहीं हो पाता ।आईये , हम कुछ उदाहरणों से देखें कि , बुजुर्गों को कैसी-कैसी अवस्था से दो चार होना पड़ता है ।
1) एक  बीमार और विक्षिप्त बुजुर्ग को ,उसके दो बेटे एक कार में लेकर आते हैं और सड़क के किनारे , सुनसान जगह पर डाल कर चले जाते हैं ।खु   उन्हें देखकर पुलिस में खबर करता है , पुलिस वाले उसे उठाकर ले जाते हैं और पूछताछ करने पर वह अपना पता बता देते हैं । पुलिस वाले उन्हें वापस अपने बेटों के पास पहुंचाते हैं और हिदायत देते हैं कि उन्हें ठीक से रखें ।
 2)  एक बुजुर्ग मां बाप को , एक बेटा अपने घर से बाहर निकाल देता है ,सामान सहित । वह बुजुर्ग दम्पति मकान के बाहर , फुटपाथ पर ही डेरा जमा लेते हैं । यह खबर जब एक स्वयंसेवी संस्था को लगती है तो उसके नुमाइंदे आते हैं और उस दंम्पति को अपनी संस्था में ले जाते हैं । बाद में उनके बेटे को समझा बुझाकर दंम्पति को वापस घर पहुंचाते हैं ।
 3) एक उच्चाधिकारी के स्वर्गवास के भाबाद उनकी पत्नी को बेटा  और बहु मिलकर अपने मकान के "गैराज पोर्शन" में रख देते हैं और सुबह शाम खाने की थाली वही पहुंचा दी जाती है ।मैं    एक महिला को नौकरी पर रखा जाता है जो दिन भर उन की देखभाल करती है । मां का इमारत के मुख्य भाग में आना -जाना मना है ।
  ये तो वे उदाहरण थे जो समा समाचार पत्रों में हां चुके हैंइसके अलावा ऐसे भी उदाहरण जंक्शन को मिलते हैंभी उदाहरण देखने को मिलते हैं  किए क्या अधिक संतान होने के बावजूद भीउदाहरण देखने को मिलते हैं किएक से अधिक संतान होने के बावजूद भीबुजुर्गों को अलग से किराए सेमकान लेकररहना पड़ता हैकहने कीदो बर्तन पास पास होंगे तो ठीक रहेंगे ही और आवाज भी करेंगेलेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि एक बर्तन को उठा कर घर से बाहर कर दिया जाएयह भी सही है कि ताली एक हाथ से नहीं बजतीताली हैरी है किसी की प्रशंसा करने के लिए बजाई जाए तो सही है लेकिन डरा नया बनाने के लिए बजाई जाए तो किसी भी रुप में सही नहीं मानी जा सकतीताली बजाने के लिए राय दोनों हाथ आमने सामने आते हैं और ठहराते हैं कभी ऐसा भी होता है कि दायां हाथ अपनी जगह पर है लेकिन बाया हाथ पूरी दूरी करके दूरी तय करके जिस जगह रहता हैकभी ऐसा भी होता है कि मैं यहां तो अपनी जगह पर है और दायां हाथ पूरी दूरी चाहिए करके उस से टकराता हैआखिर कौन है दोषीआज का युवा वर्ग या फिर बुजुर्ग स्वयंविषय गंभीर है और इस पर क्या चिंतन मनन और विश्लेषण करने की आवश्यकता हैमैंने तो ऐसा किया है क्या आपने भी इस बारे में विचार किया हैइस विषय पर आप भी चिंतन मनन और विश्लेषण करें और जो निष्कर्ष निकलेगा उसे मुझे प्रेषित करें ताकि मेरे विचार जो उबरा की भांति 0 में विचरण कर रहे हैंउन्हें दिशा और गति मिले और हो और वह धरा पर आते हुए गले का रूप मे सके 

शनिवार, 22 अगस्त 2015

आखिर भरोसा करें, तो किस पर ?

आज के जमाने मेँ अपनी जान और माल की रक्षा करना एक भयानक सरदर्द से कम नहीँ है । हर कोई चाहता है कि कोई ऐसा साधन प्रयोग मेँ लाया जाए जो भरोसेमंद हो और अपनी जान माल की रक्षा हो सके । हमने भी कुछ इस तरह के साधन के बारे मेँ विचार किया ।
१)| सिक्योरिटी गार्ड--सिक्योरिटी गार्ड, मेन गेट पर तैनात रखना एक आम उपाय है । लेकिन हमने देखा कि जब आवश्यकता होती है, चोर लुटेरे घर मेँ घुसते हैँ तो सिक्योरिटी गार्ड या तो उनके सामने बेबस हो जाता है और इनकी बंदूक तो चलती ही नहीँ,क्योंकि कभी काम ही नहीँ आती और अभ्यास ही नहीँ किया जाता ।
२) अच्छी सी नस्ल का "डोग" घर मेँ पालना , जो ज्यादातर भोंकता रहे और पड़ोसियोँ को और आने जाने वालोँ को यह चेतावनी देता रहे कि खबरदार ! हमारे यहाँ प्रवेश न करना ।लेकिन पिछले दिनोँ हमने देखा कि मुंबई मेँ राज ठाकरे के जेम्स और बाँड मेँ से बाँड नाम के डोग ने राज ठाकरे की पत्नी का चेहरी इतनी बुरी तरह से नोचा कि चेहरे पर ६५ टांके लगाने पड़े एवं साथ मेँ प्लास्टिक सर्जरी भी करनी पड़ी ।
३)  बोलने वाला तोता--जो कुछ सिखाया जाता है वह उस तरह से बोलने लगता है । कुछ लोग बाहर दरवाजे के पास तोते का पिंजरा टांग देते हैँ और चोर आने पर वह चोर आया -चोर आया चिल्लाने लगता है और चोर डर कर भाग जाता है ।लेकिन , पिछले दिनोँ हमने देखा कि महाराष्ट्र के एक शहर में एक तोता , जब कोई महिला निकल रही थी तो तोता उसको गालियाँ देता था । उसने पुलिस मेँ रिपोर्ट की ,तोते से जांच जांच पड़ताल में बुलवाया गया तो उस तोते ने कुछ भी नहीँ कहा। ऐसे ही यदि तोते ने चोर के आने पर कुछ भी नहीँ कहा तो ?
४)  cctv कैमरा -- यह एक आधुनिक उपाय है जिसे आप सतत निगाह रख सकते हैँ कि कौन आ रहा है या आपकी अनुपस्थिति मेँ कौन आया था । लेकिन आज कल चोर लुटेरे सबसे पहले केमरे पर अपना कोट या गमछा कुछ टांग देते हैँ और आराम से अपना काम करके, लूटपाट करके अपना कोट या गमछा वापस ले जाना नहीँ भूलते ।
५)  मकान मेँ किरायेदार रखना--मकान में किराएदार रखने से यह होता है कि मकान मेँ सदस्यों की संख्या बढ़ जाने से सुरक्षा बढ़ती है साथ ही हमारी अनुपस्थिति मेँ वह घर का ख्याल रखता है । लेकिन कई दफा यह पाया गया कि किराएदार ही आप की अनुपस्थिति मेँ आपके माल पर हाथ साफ करके ,आपके आने के पहले ही गायब हो जाता है ।              अब आप ही बताइए कि हम कौन सा तरीका ,कौन सा उपाय या कौन सा साधन अपनाएं कि जान माल की अच्छी तरीके से सुरक्षा हो सके। अपना तो दिमाग काम नहीँ कर रहा है ,भाई ।अाखिर भरोसा करेँ तो किस पर ?

गुरुवार, 7 मई 2015

                                    फुटपाथ पर मौत --जिम्मेदार  कौन ?
आज से १३ साल पहले फुटपाथ पर एक कार चढ़ गई और कुछ लोगोँ की जान चली गई । ऐसा पहली बार नहीँ हुआ हेै । १३ साल से पहले भी आैर १३ साल के बाद आज तक भी, हादसे होते रहे हैं आैर लोगों की जान लगातार जाती रही हेै। सर्वविदित हैे कि फुटपाथ यात्रियोँ की सुरक्षा के लिए बनाए जाते हैँ ताकि पैदल चलने वाले सुरक्षित रहेँ, लेकिन रात्रि मेँ यही फुटपाथ गरीब ,असहाय , बेघर के लिए रात्रि विश्राम के लिए बसेरा बन जाता है । दुर्घटना तो दुर्घटना है-- घटती जाती रही हेै , घटती रहेगी ,आैर लोगोँ की जान जाती रही है आैर जाती रहेगी । अब, प्रश्न यह है कि, क्या केंद्र सरकार ,राज्य सरकार,या स्थानीय निकाय इसके लिए दोषी नहीँ हैं ? मंत्री ,नेता या अधिकारी जब रात्रि मेँ अपनी चमचमाती कार से निकलते हेैं तो उन्हें फुटपाथ पर सोते लोग नजर नहीँ आते ? ऐसे बेघर लोगोँ के लिए क्या सरकार के पास कोई कार्य योजना नहीँ हेै ? आैर यदि है तो फिर क्रियान्वन क्यों नहीँ हेै ? इस तरह की दुर्घटना के मामले मेँ सरकार / स्थानीय निकाय को भी बराबर का दोषी मानकर कठघरे में खड़ा करना चाहिए । आवश्यकता इस बात की है की समस्या का स्थाई समाधान हो ओैर किसी भी गरीब ,असहाय ,बेघर को अपनी जान से हाथ न धोना पड़े ।

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

                                                               धूप और रूप 
"धूप में निकला न करो रूप की रानी, गोरा रंग काला न पड़ जाये''। 'ख़बरदार'जो यह गाना गुनगुनाया तो। किसी विरोधी दल,महिला संस्था या मीडिया वालों  ने सुन लिया ,तो आप बड़ी मुसीबत में पड़ सकते हैं। आपके खिलाफ धरने / प्रदर्शन हो सकते हैं ,F.I.R.भी हो सकती है। मेरी मानो तो ,अपना मुँह बंद ही रखें। महिलाओं को क्या करना चाहिए,कैसे कपड़े पहिनने चाहिए ,कैसे संस्कार होने चाहिए --इन सब बातों से आपको क्या लेना /देना। ''MY CHOICE"का जमाना है। मेरी तो सलाह है कि, अपनी पत्नि , बहिन या बेटी को भी कुछ मत कहिये --जमाना ख़राब है। 

बुधवार, 18 मार्च 2015

                                             किसानों की व्यथा 
आज किसान, अपने आप को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। उसकी समझ में नहीं आ रहा है कि देश में जितनी भी सरकारें आई हैं ,सभी ने किसानों की हित  की बात की है। देश में जितने भी राजनीतिक दल हैं ,जितनी भी,स्वयंसेवी संस्थाएं  हैं, किसानों के नाम पर भी  अनेक संस्थाएं हैं ,ये सब किसानों को हितैषी हैं ,और इनकी आर्थिक स्थिति सुधारना चाहते हैं। यहाँ तक है कि जिस भी नेता के पास भीड़ कम हो जाती है ,या पार्टी में हाशिये पर डाल दिया जाता है (जैसे -अन्ना हजारे व योगेन्द्र यादव ),वे भी किसानों का दामन थाम लेते हैं।बेचारा किसान , जो भी आवाज़ लगाता है ,सिर पर पोटली रख कर ,उस के पीछे हो लेता है।  
         इतना सब होने के बावजूद ,किसान की  स्थिति वहीं की वहीं है.आज भी अनेक किसान,आर्थिक तंगी से परेशान होकर आत्महत्या कर रहे हैं। बेचारा किसान ,समझ नहीं पा रहा है कि ,आखिर कौन है उसका वास्तविक हितैषी और वह करे तो, करे क्या ?