रोहन और नेहा ने माताजी और पिताजी का सारा सामन पैक करवा दिया था। वे अल सुबह 5:00 बजे की फ्लाइट से बेंगलुरु जाने वाले थे, तो सुबह 3:00 बजे ही घर से निकलना था। सामान पैक करने के बाद उन्हें तौलना भी जरूरी था ताकि वजन निर्धारित सीमा से ज्यादा न हो।
ऐसे सामान जो यदा-कदा ही काम आते थे वे दालान के एक कोने में एक छोटे से कमरे में डाल दिए थे, जिसे स्टोर का नाम दिया गया था। रोहन और नेहा स्टोर से तुला लाने स्टोर की ओर गए। उस समय क्योंकि बिजली नहीं थी ,टॉर्च की रोशनी में वहां पहुंचे, ताला खोला और अंदर से तुला उठाकर घूमे ही थे कि कोहनी की टक्कर से वहां टेबल पर रखी एक मूर्ति नीचे गिर पड़ी। दोनों ने पलट कर देखा तो उसकी एक टांग टूट चुकी थी लेकिन जल्दी में वे तुरंत निकले। दरवाजा का ताला लगाते ही उन्हें कराहने की आवाज सुनाई दी। दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा ओर नेहा बोली "सुना तुमने, यह कौन कराह रहा है"? रोहन ने इधर-उधर देखा और अंत में दरवाजे पर कान लगाकर कर बोलो "अरे,यह आवाज़ तो अंदर से आ रही है। डर के मारे दोनों की घिग्घि बंध गई।
इतने में तेज "म्याऊँ" की तेज आवाज सुनाई दी ,दोनों ने पलट कर टॉर्च की रोशनी में उस ओर देखा तो एक बिल्ली चमकती आंखों से उनकी ओर देख रही थी, उनका डर और बढ़ गया, फिर बिल्ली अपने पंजों के बल बैठकर उठने लगी। ऐसा लगा जैसे वह उन पर कूदेगी।अब तो दोनों की चीख निकल गई और दौड़ कर कमरे की ओर भागे। उन्होंने देखा कि वही बिल्ली दरवाजे उन पर कूदने वाली स्थिति में बैठी है। बिल्ली ने दोनों को घूर कर देखा और जोर से म्याऊँ बोल कर चली गई।
माता-पिता के घर से जाने के बाद उन्होंने सोने की कोशिश की लेकिन नाकामयाब रहे। अगले दिन रात के दूसरे पहर उसी समय फिर कराहने की आवाज आई।
दोनों ने थोड़ी हिम्मत की और बाहर आए, उन्होंने देखा कि यह आवाज़ तो स्टोर रूम से ही आ रही है, दोनों डर कर वापस आए तो देखा कमरे के दरवाजे पर बिल्ली बैठी है, वे और डर गये। बिल्ली के जाने के बाद उन्होंने सोने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुए। तीन दिन के बाद पिताजी वापस आ गए, तब उनको सारी बात बताई तो उन्होंने कहा कि निश्चित रूप से वह आवाज मूर्ति की ही है, वह मूर्ति एक तांत्रिक ने उनको दी थी लेकिन उन्होंने बेकार समझते हुए स्टोर रूम में रख दी थी। सारा वाकया सुनने के बाद उन्होंने निश्चय किया कि उसी तांत्रिक से मिलकर इस समस्या का निराकरण कराया जाएगा।
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