पंक्ति : आज जो ना हुआ कल उसे देखिए
आज जो ना हुआ कल उसे देखिए।
छुपकर वार करता हो छुपकर उसे देखिए।।
उसकी हर बात पर हां में हां मिलाईये।
फिर अपनी उंगलियों पर नचा कर उसे देखिए।।
अपनी धुन पर मगन होता उसे देखिए ।
जमाने से बेफिक्र होता उसे देखिए।।
उसकी हर बात से नासाज होकर ।
पागल होता हुआ उसे देखिए।।
निगाहें अब तलक तुझे ढूंढती हैं ,
लापता का अब पता पूछती हैं।
जिंदा कर दिया मुझे तेरी दुआ ने,
वरना इंतकाल हो गया था मेरी जिंदगी का।
खड़े-खड़े बस सोचते रहे ,
न इन्कार कर सके न इजहार कर सके।
दिलों के बीच आ गई थी ऐसी दरार,
हम वह दरार न भर सके।
किसी का दामन छोड़ दें , हम वो नहीं,
बीच राह में छोड़ दें , हम वो नही।
जिंदगी भर साथ निभाने का था वादा,
वह वादा तोड़ दें , हम वो नहीं।
संस्कार की ही तो बात है ,
इंसान करता वही जो ज्ञात है।
संस्कार विहीन इंसान के साथ ,
कभी न कभी होता घात है ।
समय का चक्र चला जब घड़ी की दिशा में,
बिछड़े साथी सब संग हुए ।
फिर समय का चक्र चला विपरीत दिशा में,
तो सारे रिश्ते नाते पल में भंग हुए।
कैसा भी हो परायों का खौफ,
इंसान को अक्सर सहन होता है।
जीवन दाव पर लगा देता है,
अपनों का खौफ इतना गहन होता है।
सुनकर खनक चूड़ियों की और झनकार पायल की,
कोई न जाने हालत मेरे दिल घायल की ।
पर क्या करूं दिल भी मानता ही नहीं ,
न ही सुने वह कोई भी बात इस पागल की।
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