मंगलवार, 1 नवंबर 2022

मिट्टी का शहंशाह -लघु कथा

 हरसू गांव का एकलौता कुम्हार था। आस-पास के गांव में और कोई कुम्हार नहीं था,अतः इस के बनाए हुए मिट्टी के घड़े, दीपक आदि खूब बिकते थे।उसका परिवार हंसी-खुशी अपना जीवन यापन कर रहा था।पर यह हंसी-खुशी संपूर्ण नहीं थी।एक कमी थी जो उनको और उसकी पत्नी को बहुत खल रही थी। शादी को 10 वर्ष हो जाने के बावजूद भी उनको कोई औलाद नसीब नहीं हुई थी। बहुत हकीमों के चक्कर लगाए , मंदिरों में मन्नतें मांगी। आखिरकार सफलता मिली और उन्हें एक बच्चे की सौगात मिली। परिवार मैं खुशी का माहौल हो गया था।बच्चे का नाम मनकु रखा गया। उसे बहुत लाड-प्यार से पाला जा रहा था।धीरे-धीरे बच्चा बड़ा होता गया ,उसको उसके पिताजी के मटके, दिए बनाते देख बड़ा आश्चर्य होता था और वह भी उनके साथ काम करने का प्रयत्न करता।उसके कपड़े मिट्टी में सन जाते तो उसकी मां उसे बहुत डांटती , उसने मनकू ने सोचा कि कपड़े नहीं पहनूँगा तो डांट भी नहीं पड़ेगी और वह,वैसे ही,इसी अवस्था में पिता के काम में आनंद लेने लगा। वह अपने दोस्तों के साथ ऐसे ही,इसी अवस्था में, खेलने लगा । उसके दोस्त उसका मजाक करने लगे तो उसका स्वाभिमान जाग उठा और वह अपने दोस्तों को ललकारने लगा। दोस्त भी कम नहीं थे वे कहते तू क्या है हमारे सामने, चुप रह। तो उसने वहीं पास के मंदिर की सीढ़ियों पर कुछ ईटें जमाई और इस तरह से बैठ गया जैसे बादशाह हो। दोस्त हंसने लगे और पूछा ,अरे भैया तू है क्या यह तो बता ? तो उसने कहा कि रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं और- - ,बीच में ही बच्चे बोल उठे बस,बस रहने दे ज्यादा डायलॉग मत सुना। मनकु ने फ़िर कहा कि मैं ही बादशाह हूं और तुम्हारी फरियाद सुनना चाहता हूं। उसके आत्मविश्वास के सामने उसके दोस्तों को चुप होना पड़ा और वह खिल खिलाकर हंस पड़ा ,और बार-बार कहने लगा हम बादशाह हैं , हम बादशाह हैं । सच है कि किसी व्यक्ति के जीवन में आत्मविश्वास हो तो वह सफलता की ओर अग्रसर होगा ही होगा।

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