मंगलवार, 15 नवंबर 2022

भाई हो तो ऐसा-- लघु कथा


# दिनांक 15 /11/ 2022

 स्वरचित 

 सतीश गुप्ता पोरवाल 


गोलू का परिवार आर्थिक रूप से अत्यंत पिछड़ा परिवार था।उसके पिता मकान में पुताई का एवं मां घरों में बर्तन साफ करने का कार्य करती थी,जिससे बस गुजारा हो पाता था।वे मकबरे के पास ही एक छोटी सी झोंपड़ी में रहते थे।गुल्लू का पीछा करते हुए,अल्प समय में ही यानी एक बरस में ही उसको एक बहिन भी मिल गई थी।बहिन काफी चंचल थी तो उसका नाम उसकी मां ने गोली रख दिया था। दोनों भाई बहिन आपस में खेलते ,लेकिन गोली का जी नहीं भरता और वह पड़ोस में ,उसकी  मां जहां बर्तन साफ करती थी,उन घरों के बच्चों के साथ खेलने के लिए पहुंच जाती।उन बच्चों को यह अच्छा नहीं लगता था,वे उसको भगा देते थे। गोली रुआँसी होकर वापस घर आ जाती थी। गोलू ने उसे समझाया कि हमारे बचपन और उनके बचपन में अंतर है। वे बड़े लोग हैं,तुझे साथ में नही खिलाएंगे। गोली उदास हो गई और कहा कि हमारे पास तो कोई खिलौने भी नहीं हैं,उनके पास तो ढेरों हैं।तो गोलू ने कहा कि हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं कि बाजार से खिलौने खरीदे सकें।लेकिन तू चिंता मत कर, मैं तेरे लिए खिलौने बनाने की कोशिश करता हूं। उसने अपने पिता की छेनी,हथौड़ी,कीलों आदि से लकड़ी के टुकड़े लेकर एक खिलौना बना दिया। गोली बहुत खुशी हो गई।गोलू ने इस तरह कुछ और खिलौने बनाए। वे आपस में इन खिलौनों से खेलने लगे ।उन्हें अब किसी और के खिलौनों की जरूरत नहीं थी।उसे अपने भाई पर गर्व हुआ और उसने गोलू को बोला- सुन भैया--"भाई हो तो ऐसा"। गोलू ने पलट कर जवाब दिया--"चल पगली"।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें