स्वरचित--
सतीश गुप्ता पोरवाल
जिंदगी को बहुत गिला है मुझसे,
समझ में नहीं आता चाहती क्या है मुझसे।
एक दिन मैं भी आसमान में समा जाऊंगा,
इस दुनिया से हमेशा के लिए चला जाऊंगा।
जरा ठहरो मुझे सोच तो लेने दो,
इस दुनिया में क्यों आया समझ लेने दो।
सच तो यह है मेरे दोस्तों मैं स्वयं नहीं आया
मुझे अपनों के द्वारा लाया गया।
अब जब आ ही गया हूं इस दुनिया में,
मेरे अपनों की इस सुंदर बगिया में।
तो समझ लेने दो दुनिया क्या है ।
वो दर्द-ए-ग़म बयां क्या है।
जिस दिन यह रूह रूठ कर चली जाएगी,
उस दिन यह जमीं यह कायनात मेरी हो जाएगी।
उस दिन कुछ निशाँ छूटेंगे जरूर मुझसे,
मेँ जमीं पर हूं तब तक आसमान दूर है मुझसे।
हौसला पस्त ना हो उड़ान पर हो,
नजर अपने पे नहीं सारे जहान पर हो।
मंजिल दूर नजर आती जरूर है,
लगता है जैसे यह बहुत ही दूर है।
लेकिन हौसला हमारा किसी से कम नहीं,
सोच लो अगर तो फिर कोई गम नहीं।
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