मंगलवार, 25 जुलाई 2023

ठिकाना-- कविता

 मेरा कोई ठिकाना नहीं तेरे सिवा, 

 दुनियाँ ने तो मेरा वज़ूद ही मिटा दिया।

क्या क्या ख़ाब देखे थे इस दुनियाँ में,

फूलों की तरह महकूँगा इस बगिया में।

 लेकिन सारे ख्वाब सूखे पत्तों की तरह बिखर गये,

 महल जो बनाये थे सपनों के वे सब ढ़ह गये।

 अब हम जाएं तो जाएं कहां,

छोटा पड़ गया मेरे लिए यह जहां।

कभी यहां कभी वहां डोलता रहता हूं,  

असमंजस के झूले में झूलता रहता हूं।

ए दुनियाँ वालों मुझे और न सताओ,

हो ग़र कोई ठिकाना तो मुझे बताओ।

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