जब से हमने होश संभाला है "गरीबी हटाओ" और "महिलाओं को सशक्त बनाओ" के नारे सुनते आये हैं, सुन रहे हैं और , ना जाने कब तक, सुनते रहेंगे। ऐसा नहीं है कि प्रयास नहीं हुए ,प्रयास हुए , लेकिन प्रभावी नहीं हुए । वर्षों बीत जाने के बाद भी ,आज भी , हम वही महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, यह चिंता का विषय है। हर्ष होता है इस बात से कि पोरवाल समाज भी अन्य समाजों के साथ खड़ा है, इस दिशा में अलख जगाने को और सार्थक प्रयास करने को तत्पर भी है ।हमने देखा है कि सरकार ने महिलाओं से संबंधित नए कानून बनाए हैं / संशोधन किए हैं और स्थानीय न्यायालयों से लेकर शीर्ष न्यायालयों ने महिलाओं के प्रति अपराध करने वालों को समय-समय पर दंडित भी किया है , लेकिन क्या यह असरदार रहा ? यदि कानून बनाने से और सजा देने से अपराध समाप्त हो सकते तो , अब तक चोरी, लूट , बलात्त्कार , हत्या आदि अपराध समाप्त हो गए होते । स्पष्ट है कि सरकार कानून बना सकती है , न्यायालय सजा दे सकता है लेकिन अपराध को ,कुछ सीमा तक तो कम कर सकते हैं किंतु, समाप्त नहीं कर सकते । महिलाओं के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार ,असम्मान ,अत्याचार ,अन्याय और दुष्कर्म पर यही बात लागू होती है । हां , सरकार और न्यायालयों के फैसलों से महिलाओं का मनोबल अवश्य ही बढ़ा है और हम देख रहे हैं कि इन अपराधों के विरोध में अब महिलाएं खुलकर सामने आने लगी हैं ।
जब से दो या तीन बच्चों का चलन हुआ है ,बेटा और बेटी में अंतर न के बराबर हो चुका है । शिक्षा एवं आर्थिक क्षेत्र में लड़कियों ने आशातीत प्रगति की है और इनकी स्थिति इन क्षेत्रों में लड़कों से कम नहीं है । महिलाओं की स्थिति यदि चिंतनीय और दयनीय है और उनको दोयम दर्जे में समझा जाता है तो उसका कारण है सामाजिक स्तर में अंतर । अभी भी पुरुषों एवं महिलाओं के सामाजिक स्तर के बीच एक गहरी खाई है , बावजूद इसके कि महिलाएं शिक्षा एवं आर्थिक रूप से संपन्न हैं । इस खाई को पाटने का काम न तो सरकार कर सकती है और ना ही कोई न्यायालय । यदि कोई कर सकता है तो वह है ,व्यक्ति , परिवार और समाज ।
इस समस्या का मुख्य कारण महिला व पुरुष के साथ संलग्न वैवाहिक और सामाजिक रीति रिवाज में जमीन आसमान का अंतर होना है ।बच्चे के , जन्म से लेकर मृत्यु तक , आयोजनों में "कुछ ना कुछ" करने का दायित्व महिला के परिवार वालों का ही होता है । 'न जाने कितने' वर्षों पुराने इन रिवाजों को बदलने के बारे में कोई नहीं सोचता । आश्चर्य की बात तो यह है कि महिलाएं भी नहीं , शायद इसलिए कि महिलाओं की सुलभ.प्रवत्ति है कि बिना खर्च किए कहीं से मिल जाए चाहे स्वयं के पीहर से हो या बहू के पीहर से । कभी-कभी लगता है कि महिलाएं अपनी सामाजिक स्थिति या स्तर से संतुष्ट हैं और इस घेरे से बाहर निकलने को व्यग्र नहीं है । छोटे / बड़े महिला क्लब और महिला सामाजिक संगठन की बैठकें होती रहती है लेकिन इनमें महिला सशक्तिकरण के बारे में विचार विमर्श करके ठोस कदम उठाने के बजाय खेल-कूद और मनोरंजन - हाउजी /चम्मच दौड़/ कुर्सी दौड़ /रंगोली आदि करके ही अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है ।
संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि महिलाएं स्वयं ही जागरूक होंं । "उसकी साड़ी मेरी साड़ी से सफेद क्यों" की भावना से बाहर निकलकर उसकी कमीज मेरी साड़ी से सफेद क्यों की भावना को अंगीकार करें । इस विषय पर मात्र चर्चा करने से कुछ नहीं होने वाला इस दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है तभी परिणाम प्राप्त हो सकते हैं वरना तो यह विचार , मात्र एक सपना ही बनकर रह जाएगा ।
जब से दो या तीन बच्चों का चलन हुआ है ,बेटा और बेटी में अंतर न के बराबर हो चुका है । शिक्षा एवं आर्थिक क्षेत्र में लड़कियों ने आशातीत प्रगति की है और इनकी स्थिति इन क्षेत्रों में लड़कों से कम नहीं है । महिलाओं की स्थिति यदि चिंतनीय और दयनीय है और उनको दोयम दर्जे में समझा जाता है तो उसका कारण है सामाजिक स्तर में अंतर । अभी भी पुरुषों एवं महिलाओं के सामाजिक स्तर के बीच एक गहरी खाई है , बावजूद इसके कि महिलाएं शिक्षा एवं आर्थिक रूप से संपन्न हैं । इस खाई को पाटने का काम न तो सरकार कर सकती है और ना ही कोई न्यायालय । यदि कोई कर सकता है तो वह है ,व्यक्ति , परिवार और समाज ।
इस समस्या का मुख्य कारण महिला व पुरुष के साथ संलग्न वैवाहिक और सामाजिक रीति रिवाज में जमीन आसमान का अंतर होना है ।बच्चे के , जन्म से लेकर मृत्यु तक , आयोजनों में "कुछ ना कुछ" करने का दायित्व महिला के परिवार वालों का ही होता है । 'न जाने कितने' वर्षों पुराने इन रिवाजों को बदलने के बारे में कोई नहीं सोचता । आश्चर्य की बात तो यह है कि महिलाएं भी नहीं , शायद इसलिए कि महिलाओं की सुलभ.प्रवत्ति है कि बिना खर्च किए कहीं से मिल जाए चाहे स्वयं के पीहर से हो या बहू के पीहर से । कभी-कभी लगता है कि महिलाएं अपनी सामाजिक स्थिति या स्तर से संतुष्ट हैं और इस घेरे से बाहर निकलने को व्यग्र नहीं है । छोटे / बड़े महिला क्लब और महिला सामाजिक संगठन की बैठकें होती रहती है लेकिन इनमें महिला सशक्तिकरण के बारे में विचार विमर्श करके ठोस कदम उठाने के बजाय खेल-कूद और मनोरंजन - हाउजी /चम्मच दौड़/ कुर्सी दौड़ /रंगोली आदि करके ही अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाती है ।
संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि महिलाएं स्वयं ही जागरूक होंं । "उसकी साड़ी मेरी साड़ी से सफेद क्यों" की भावना से बाहर निकलकर उसकी कमीज मेरी साड़ी से सफेद क्यों की भावना को अंगीकार करें । इस विषय पर मात्र चर्चा करने से कुछ नहीं होने वाला इस दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है तभी परिणाम प्राप्त हो सकते हैं वरना तो यह विचार , मात्र एक सपना ही बनकर रह जाएगा ।
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