बुधवार, 18 मार्च 2020

" अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस और महिला "
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  लो जी , हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी , अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मन ही गया । असंख्य महिलाओं और पुरुषों ने इस अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर असंख्य ही शुभकामनाएं एवं बधाईयां दीं। कहीं पर कुछ पुरस्कार बांटे गए , कुछ को सम्मान दिया गया और कहीं पर एक दिन के लिए मुफ्त यात्रा का लॉलीपॉप दिया गया । वर्ष में एक दिन महिलाओं के नाम हो गया लेकिन शेष 364 दिनों के लिए क्या ? वे तो पुरुषों के नाम ही हैं । स्त्रियों को वर्ष में 1 दिन दे देने से महिलाओं का क्या भला हो जाएगा  ? महिला तू महान है , महिला तू शक्ति है , महिला तू पूजनीय है- इस तरह के जुमलों से ही महिला खुश हो जाती है । वास्तव में महिलाओं की प्रकृति ही ऐसी है कि वे थोड़े में ही प्रसन्न हो जाती हैं और इतने में ही संतुष्ट हो जाती हैं । यही कारण है की शैक्षिक और आर्थिक रूप से उन्नति करने के बावजूद भी , सामाजिक रूप से महिलाओं और पुरुषों में बहुत असमानता है । देवता  और देवियों  को हम समान रूप से पूजते हैं , दोनों को और उनके परिवारों को  हम समान रूप से सम्मान देते हैं , तो फिर  जगत में , पुरुष और महिला  को बराबर सम्मान क्यों नहीं ? महिला चाहे राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री ,मंत्री ,कलेक्टर , एस पी आदि कुछ भी बन जाए लेकिन रह जाती है सिर्फ महिला ही - सामाजिक रूप से ।
   आइए इसको विस्तृत रूप से समझने का प्रयत्न करें । मान लें की महिला राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री की पुत्री का विवाह होता है , तब भी उन्हें ही लड़के वालों को ( पुरुष वर्ग को ) सगाई देनी पड़ेगी, उसी महिला के भाई या पिता को मामा भात ( मायरा ) देना पड़ेगा । विवाह में नाना प्रकार की सामग्री भी वधू के साथ देनी होगी । क्या ऐसा संभव होगा कि सगाई लड़के वाले लड़की के परिवार वालों को दें या मामा भात की जगह चाचा भात हो । या तो इन रस्मों को समाप्त कर दिया जाय या फिर इस तरह की रस्में दोनों ही ओर से , एक दूसरे के लिए होंं ।
ऐसा नहीं है की पहल नहीं हुई , बरसो-बरसो पूर्व कोटा के एक स्वजातीय इंजीनियर युवक ने सगाई में मात्र एक रुपया लिया और दहेज में कुछ नहीं , लेकिन अफसोस कि उसका अनुसरण नहीं हुआ । कुछ वर्ष पूर्व कोटा के ही एक स्वजातीय प्रतिष्ठित परिवार में लड़के की शादी में सगाई नहीं ली , इसका भी अनुसरण नहीं हुआ । मैंने स्वयं अपनी तीनों पुत्रियों के विवाह में मामा भात (मायरा) नहीं लिया लेकिन संतोष की बात है कि इसका कुछ अनुसरण हुआ और विगत कुछ वर्षों में देखा गया कि कई विवाह समारोहों में इस रिवाज (मामा भात /मायरा ) को दरकिनार कर दिया गया और इस तरह का चलन गति पकड़ने लगा है।
    बरसों से ऐसा ही चला आ रहा है ऐसा कह कर , ऐसे अनेक रीति-रिवाजों का बचाव करना ठीक नहीं । समय आ गया है कि अब , जन्म से लेकर मृत्यु तक महिला पक्ष ही पुरुष पक्ष को दे , ऐसे रीति-रिवाजों में संशोधन किया जाय  । जब संविधान में और कानून में संशोधन हो सकता है तो रीति-रिवाजों में क्यों नहीं ? विश्लेषण करें और ठोस निर्णय लें, महिलाओं के पक्ष में ।


 सतीश कुमार गुप्ता 'पोरवाल' मानसरोवर , जयपुर ।
     मोः। 94140 47338

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