बात उस समय की है जब मैं कक्षा दसवीं में पढ़ रहा था । तीन दिन की छुट्टियां थीं,मैं और मेरा छोटा भाई बारां से कोटा आये। कोटा में 3 दिन बुआ और मौसी के रहने के पश्चात वापस बारां के लिए रवाना हुए। लाल रंग की बस थी। उस समय बसें "मुंह" वाली हुआ करती थी। रास्ते में काली सिंध नदी पड़ती है।अत्यधिक बरसात हो जाने के कारण पुलिया के ऊपर काफी पानी बह रहा था।नदी का पाट भी काफी लंबा था ।कुछ बसें, जीप,कार बगैरह वहीं रूके हुए थे। हमारी बस का ड्राइवर थोड़ा 'मूडी' लेकिन हिम्मतवाला था, जिसे लोग गुरु के नाम से पुकारते थे।उन्होंने हिम्मत के साथ बस को नदी की पुलिया पर उतार दिया। बस आगे बढ़ती गई ,लगभग मध्य में पहुंचने के बाद बस के पहियों पर बहुत ज्यादा दबाव पड़ा और 'स्टीयरिंग' घूमने लगा।ड्राइवर गुरु जी के ललाट पर पसीना आने लगा, उन्होंने तुरंत कंडक्टर को आवाज देकर बुलाया और कहा कि 'स्टियरिंग' को तुम भी पकड़ो और जरा भी घूमने मत देना, कंडक्टर ने ऐसा ही किया।हम लोगों की सांस ऊपर-नीचे हो रही थी, हलक सूख रहा था, कहीं बस बह गई तो ! सभी यात्रियों ने बजरंगबली की जय - बजरंगबली की जय नारे लगाना शुरू किया और बस धीरे-धीरे चलती हुई नदी को पार कर गई। सब यात्रियों की सांस में सांस आई।
वह घटना आज तक मस्तिष्क पर अंकित है।
Mssa
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