रविवार, 4 अगस्त 2024

मुक्तक

 फिर एक बार तेरी महफिल में आएंगे सनम,

 तेरे दर पर दर्द भरे नगमे गुनगुनाएंगे सनम।

 फिर भी तू न  मानी तो, अब तू ही बता,

  तेरी दुनियां को छोड़कर,कहां जाएंगे सनम। (१)

अंदर का शोर मुझे सोने नहीं देता,

कुछ अनहोनी तो होने नहीं देता।

कुछ पाऊं ना पाऊं यह दीगर बात है,

लेकिन जो कुछ पाया,वह खोने नहीं देता। (२)

नहीं नहीं, नहीं मैं फूलों का सुंदर हार हूं,

 किसी न किसी के लिए कुछ तो गुनहगार हूं।

 मैं तो जानता हूं बस इतना ही ,

 कि मुरझाए फूलों के लिए मैं जाने बहार हूं। (३)

मन नहीं है रिक्त यह तो धर्म से है लबालब 

तन नहीं है थका हुआ यह कर्म करे अब-तब

अपनी प्रकृति से कर दे सब को प्रभावित 

ऊपर वाला दे अवसर उन्हें जब-जब। (४)

मानव जन्म मिला है,धर्म-कर्म से रच ले नई कहानी,

अंत समय तो फिर,यह काया मिट्टी में है मिल जानी। (5)

तुम नहीं थे अपने फिर क्यों हमें अपने लगे थे,

मेरे अधूरे जीवन के तुम क्यों पूरक सपने लगे थे।

तुम तो शायद अपने आप को ही अपना समझते हो,

गलत हम ही थे,परायों को अपना समझने लगे थे। (6)

माना कि हमारे वादे पर तुम्हें एतबार नहीं है, 

ये न सोचो कि हमें तुम्हारा इन्तज़ार नहीं है। 

ये समझ लो कि हम त कतई बेवफा नहीं ,

नहीं हो सकता कि हमारा दिल बेकरार नहीं है।(7)

हरी-भरी हुई धरती,चहुं और छाई हरियाली है,

 उदासी हुई दूर अब मन पर छाई खुशहाली है।

गमों के बोझ को क्योंकर ढोना है हम सबको,

क्यों न समझें हम कि आज ही होली और दिवाली है।(8)

न जाने सब की नींद को क्या हो गया है,

कोई तो फूलों की क्यारी में कांटे बो गया है।

चैन और सुकून जो था जिंदगी में भरपूर,

 अब वह न जाने कहां खो गया है।(9)

अक्सर जो जैसा होता है वैसा नजर नहीं आता,

तुम्हारा यह स्वांग हमें बिल्कुल भी नहीं भाता।

क्यों असली को छोड़ नकली बना फिरता है,

जो दिल में है वही बात जबान पर क्यों नहीं लाता।(10)

आज के इस दौर में कोई भी कहां महफूज है,

हर शख्स बस अपने में ही मशगूल हैं,

स्पष्ट कहूं तो बस यही कहूं कि,

है यहां खामोश लब, चीखती रूह है। (11)



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