बुधवार, 24 जुलाई 2024

रास्ते का पत्थर -- कविता

 इस फरेबी दुनिया में,

 हम प्यार से ठगे गये।

 हमने फूल बिछाए राहों में,

 वो कांटे बिछाकर चले गए।

 अब तो फूलों पर भी ऐतबार न रहा,

 प्यार का अब तो खुमार भी न रहा ।

राह निहारते थे जिनकी पल पल,

 अब तो उनका इंतजार भी न रहा। 

आखिर कहां जाएं, क्या करें ,

राह कोई नजर आती नहीं,

 अनमना, गुमसुम सा हो रहा मन,

बात कोई भी उमंग जगाती नहीं। 

कटी पतंग सा डोल रहा है मन,

 विरह वेदना से भर गया हूं मैं।

तेरी राह में  बिछाए थे फूल,

 लेकिन रास्ते का पत्थर बन गया हूं मैं।

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