सोमवार, 22 जुलाई 2024

गमों की बरसात - कविता

 खुशियों की कोई सौगत मेरे लिए नहीं थी,

 गमों की पोटली लिए सब मेरे लिए खड़े थे।

 सबकी राहों में बिछ रहे थे फूल,

  मेरी राह में बस कांटे पड़े थे। 

दुनिया में जब आया तो बहुत रो रहा था,

मेरे साथ साथ कोई भी न आंसू न बहा रहे थे।

 कुछ एक दूसरे को दे रहे थे बधाई, 

और कुछ मुझे देखकर मुस्कुरा रहे थे।

दुनिया के उपवन में गुमसुम खड़ा था,

 खुशियों के फूल मुझे चुनने थे।

 जो हो चुका उसका चोला हटाकर,

  अब तो नए सपने मुझे बुनने थे।

पतझड़ का मौसम बहुत झेल चुका,

 अब तो मुझ पर भी बहार आने दो। 

गमों के बोझ को कांधे से हटाकर, 

खुशियों की कल-कल नदिया बहाने दो। 

आसमान में घनघोर घटा छा गई ,

लेकिन कहीं और जाकर पानी बरसा गई।

बादलों की बारिश में हम अकेले ही थे, 

जब बरसी खुशियां न जाने भीड़ कहां से आ गई।

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