दुनिया भर का सब कुछ नजर आता,
नहीं झांकते अपने अंदर में।
सात समंदर पार की डींग हांकते,
खुद समाए किसी समंदर में।
अपने साए में ही हरदम गुम रहते,
नहीं घुल-मिल जाते किसी मंजर में।
मानव बनकर करते अजीब सी हरकतें,
खुद मानवता ढूंढते बंदर में।
सौ-सौ झूठ बोलते नहीं अघाते,
हाथों में फूल,निगाहें रहती खंजर में।
रहना चाहे खुद बाग बगीचे में,
चाहे डालें दूसरों को बंजर में।
Mskm
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