बेदर्द अपने,बेदर्द पराए, यहां बेदर्द है हर कोई,
हर कोई अपना दर्द जाने ,मेरा दर्द न जाने कोई।
कितने कांटे हैं मेरी राहों में, यह कोई न जाने,
मैं कितना ही जताऊं जमाने को,कोई न माने।
प्रबल हो उठती हैं मेरी भी इच्छाएं, कभी-कभी
चाहता हूं कुछ तो पूरी हो जाएं,अभी बस अभी।
ये इच्छाएं या अभिलाषाएं कुछ सिमटती हुईं,
चाहती नहीं छोड़ना, रहती हैं मुझसे लिपटती हुईं।
समंदर की लहरों की मानिंद दुख आते हैं जाते नहीं,
मेरे ही घर में क्यों, दूसरों के घर में डेरा जमाते नहीं।
क्या इनका मेरे ऊपर, पिछले जन्म का कोई कर्ज है,
इसीलिए क्या मुझको सताना इनका एकमात्र फर्ज है।
अब तो दिल को समझाता हूं यही दर्द तेरे भाग्य में है,
नहीं कोई मात्रा,भार,मापनी तुम्हारे अपने काव्य में है।
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