गुरुवार, 19 दिसंबर 2024

हासिल ना हुआ -- कविता

 जो हासिल न हो सका ,आखिर उसका मलाल क्यों करें,

हम खुद अपने आप में सिमट जाएं, ऐसा हाल क्यों करें।

 तमन्ना तो हर किसी की होती है बहुत कुछ पाने की,

  ना मिले तो जरूरत है अपने आप को समझाने की। 

मुसाफिर को जाना कहीं है लेकिन कहीं और जाएंगे,

 इस तरह भटकेंगे तो आखिर मंजिल को कैसे पाएंगे।

कुछ लोग कहते हैं कि क्या करें किस्मत में नहीं था, 

लेकिन सच तो यह है कि जितना करना था किया नहीं था।

मौसम आते हैं, जाते हैं और फिर लौट कर आते हैं,

सूरज और चंदा रात को दिन, दिन को रात बनाते हैं।

समय कभी भी स्थाई रूप से कहीं नहीं जाता है,

जो कर्म करता है उसका फल अवश्य ही पाता है।

जो यह सोचते हैं कि यह तो हमें हासिल नहीं होगा,

 तो मानिए कि वह हासिल करने के काबिल नहीं होगा।


Mssa


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