देखो जी यह कैसा अंधा युग अब आया है,
अपराध करे कोई, किसी और को अपराधी दिखलाया है।
मंजिल तो सबकी एक सभी यह जानते हैं,
लेकिन एक साथ चलना कहां चाहते हैं।
कुटिल लोगों के मन में भ्रम जाल है बड़ा रचा हुआ,
सबके मन में निज स्वार्थ है कूट-कूट कर भरा हुआ।
निजी स्वार्थ के खातिर अपनों को तो छोड़ दिया,
अपनों से जो नाता था पल भर में तोड़ दिया ।
चलता है जमीन पर देखता है आसमान की ओर,
ऐसे लोगों के स्वार्थ का नहीं होता कोई भी छोर।
आंख सजल हो जाए किसी का दुःख दर्द देखकर,
दिल जिनका भर आए किसी को विपत्ति मे देखकर।
इंसानियत जिनमें नजर आ जाए ऐसे लोग मिलेंगे कम,
हैवानियत का तो बोलबाला है यही है सबसे बड़ा गम।
गलत तो नहीं कहते लोग कि यह कैसा अंधायुग आया है,
सच कहते हैं कि कलयुग आया है, कल युग आया है।
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