यूं ही कोई पराया नहीं हो जाता है ,
प्रेम भाव शून्य में खो जाता है।
आखिर कोई तो है जो चलते चलते,
बीच राह में कांटे बो जाता है ।
दुनिया में जब आए तो सब अपने थे,
यहां पर पाले कितने ही सपने थे।
जब होश संभाला तो सामने आया,
इनमें से आखिर अपने कितने थे।
प्रेम भाव का यहां अकाल पड़ा हुआ,
हर एक जुबां पर प्रश्न खड़ा हुआ।
मैं हूं बस मैं ही हूं जहाँ मे,
समभाव पर यहां तमाचा जड़ा हुआ।
हर कोई यहां एक दूसरे को समझाता है,
पर समझ में नहीं किसी को आता है।
कोई तो बात होती है आखिर,
यूं ही कोई पराया नहीं हो जाता है।
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