मेरी कलम की धार थी बहुत ही तेज,
इसने अच्छे अच्छों के खोल दिए थे भेद।
कोई फर्क नहीं पड़ता था कौन क्या है,
नहीं जानती कौन कर्मचारी और कौन नेता है।
अन्याय के खिलाफ इसने खूब आवाज उठाई है,
रिश्वतखोरों,भ्रष्टाचारियों की साख मिट्टी में मिलाई है।
जैसे-जैसे मेरी कलम तेज और तेज चलने लगी
तो कुछ लोगों को यही कलम खलने लगी।
कलम के निशाने पर थे वे करने लगे मंत्रणा,
सब मिलकर देने लगे इसे नाना प्रकार की यंत्रणा।
ऐसे सभी लोगों ने आपस में हाथ मिला लिए थे,
और मेरी कलम को दबाने के लिए तैयार हो लिए थे।
कुछ लोगों ने कहा दबाने से काम नहीं चलेगा,
इसको कुचल देना ही बेहतर उपाय रहेगा।
तब से दबाने और कुचलने का क्रम जारी रहा,
बेचारी कलम पर चौतरफा दबाव बहुत भारी रहा।
बावजूद इसके अभी भी मेरी कलम बोलती है,
कई सफेदपोशों के छुपे राज खोलती है ।
चाहे लोगों को यही कलम अभी भी खलती है ,
लेकिन यही दबी कुचली कलम अभी भी चलती है
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