मुड़ना फिर पीछे देखना,
यह हमारी फितरत में नहीं।
लेकिन हम अपनी फितरत भी बदल डालते
एक बार आवाज तो दी होती।
मोहब्बत तो खूब करते हैं हम तुमसे,
हमारी मोहब्बत का कोई सानी नहीं।
यही मोहब्बत जागती है रात भर,
पल भर को भी यह नहीं सोती।
हम तुम्हें मानते हैं बगिया का एक महकता फूल,
हवा का झोंका महका देता है मेरे मन को।
तुम्हें चाहे कली से बनता फूल कहूं
या फिर सीप में पड़ा खूबसूरत मोती।
अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है मुझे,
तू चाहे उजाले में विचरण करती रहे।
नहीं है मुझे फिर भी कोई भी गम,
मैंने मान लिया तुझे मेरे जीवन की ज्योति।
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