सूखी जड़ हरा पेड़, बड़ा अचरज है भाई,
संभव है, किसी ने मुझे यह बात समझाई।
जब भी सुखों पर, दुखों की बदली छाई,
मन को आशा की किरण ने राह सुझाई।
गत को करें नमन, आगत का अभिनंदन,
राह दिखाई हमको, उनका करते हैं वंदन।
जो कुछ हो गया हो गत में, भूल उसे जाएं,
राग-द्वेष न रहे, कलुषित न हो हमारा मन।
नाकाम रहा व्यक्ति तो दोष दूसरे पर मढ़ता है,
संयम रखो, याद रखो, संघर्ष पहचान गढ़ता है।
मैंने तो वह कर दिया है जो मुझे करना था,
हमारे पराधीन देश को आजाद करना था।
खुश हूं कि देश प्रेम की भावना बह रही है,
नन्हें-मुन्नों के हाथों में भी तिरंगा देखना था।
देश के वास्ते मर जाएंगे,मिट जाएंगे हम,
खून का हर एक कतरा बह जाए,न होगा गम।
देश प्रेम में रंगा मन, कुछ भी करने को तैयार,
सेवा देश की करने को, लेंगे एक और जनम।
खिलौना बनकर रह गया हूं नियति के हाथों में,
शून्य सा हो गया हूं मैं अपने ही जज़्बातों में।
क्या करूं,क्या न करूं, बड़ा असमंजस है,
कुछ भी वज़न नहीं रह गया अब मेरी बातों में।
दर्द देकर हमदर्द बनते हो, यह तो कोई बात नहीं,
अपने वो होते हैं जो संबल बनते हैं, करते घात नहीं।
ऐसे दिल बस कहने को ही दिल होते हैं,
जिनमें बस शून्य व्याप्त हो,रहते कोई जज़्बात नहीं।
माना कि कंधों की हालत करता खस्ता,
बोझ नहीं,ज्ञान का भंडार है यह बस्ता,
महकता भविष्य बना देता है सबका-
यह पुस्तकों से भरा गुलदस्ता।
माना कि भारी भरकम है,कंधों की हालत करता खस्ता,
बोझ नहीं मानो इसे,ज्ञान का भंडार है यह बस्ता,
फूलों सा महकता भविष्य बना देता है सबका-
यह,रंग बिरंगी पुस्तकों से भरा हुआ गुलदस्ता।
इस उपवन की एक कली थी ,अब बदल रहे हैं भाग,
पर द्वारे जाकर के , उस घर को बनाऊंगी मैं बाग।
दिल में भक्ति, तन में शक्ति, मन में विश्वास हो,
तो काहे को, हे मनवा इस जग में निराश हो।
धर्म कर, कर्म भी संग-संग कर लें -
पग-पग चलता चल, जब तक तन में श्वास हो।
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