बुधवार, 30 जुलाई 2025

मन टूटा हो तो - कविता

 आसमां भी पाताल लगे, जब मन टूटा हो तो, 

पछताना ही विकल्प लगे, जब कुछ छूटा हो तो।

रस्सी टूटे,बंधन छूटे,फिर कश्ती छूट जाये किनारे से,

मन ही जब लड़खड़ा जाये,न चले किसी सहारे से। 

मन आखिर क्यों दुखी रहे, क्यों न यह सुखी रहे,

जैसी परिस्थिति ढलते रहो,जैसे फूल सूरजमुखी रहे।

हल्की बयार हो या हो झंझावात, कभी डगमगाना नहीं,

कश्ती को यूं मझधार में छोड़कर कभी भी भागना नहीं।

गिर-गिर कर गिरना नहीं, गिरकर उठना ही जिंदगी है,

हौसला रखकर आगे बढ़ना ही, जिंदगी की बंदगी है।

अगर कस ली है कमर,दुर्दिनों से दो-दो‌ हाथ करने की,

तो क्यों महसूस हो जरूरत,समझौते की बात करने की।

टूटे हुए दर्पण में झांको तो, स्व छवि मलीन ही दिखाता है,

ले लें जब दृढ सकल्प, तो फिर दुखों से पार पा जाता है।

Mssa

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