शनिवार, 10 मई 2025

मां, ममता की मूरत - कविता

 तेरे कदमों के तले ओ मां मेरे आसमां और जमीं,

 तेरे आंचल सी छांव तो कहीं और से मिलती नहीं।

 सर पर हों तेरे हाथ तो छत की जरूरत क्या होगी,

 ए मां तेरी जैसी और ममता की मूरत क्या होगी।


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