इंसान को इस जगत में शिशु के रूप में लाया जाता है, और जब वह आ जाता है तो उसे जीना भी होता है। जीने की विधा अलग-अलग हो जाती है। यह विधा कुछ तो उसकी खुद की प्रवृत्ति पर निर्भर होती है व कुछ उसको मिले वातावरण पर।हम देखते हैं कि बालपन से ही कुछ बच्चे अपने आप में ही मस्त रहते हैं और मिलना,बातचीत करना उनकी प्रकृति में कम ही रहता है और कुछ ऐसे होते हैं जो अधिक से अधिक लोगों से बात करते हैं,प्रेम दर्शाते हैं,कई तरह के खेलों में रुचि रखते हैं। यह प्रवृत्ति समय के साथ बढ़ती ही जाती है। कुछ बच्चे पढ़ने के साथ-साथ अन्य विधाओं में भी उतनी ही रुचि लेते हैं और कुछ पढ़ाई में ही व्यस्त रहना पसंद करते हैं। देखा जाता है कि ऐसे बच्चे जो अपने आप में ही मस्त रहते हैं या केवल पढ़ाई में ही व्यस्त रहते हैं, वे जीवन में आगे जाकर अपने आप में ही सिमट कर रह जाते हैं और एकाकीपन के शिकार हो जाते हैं। जीवन के उत्तरार्ध में मित्रों और सगे संबंधियों का साथ बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है लेकिन उसके पूर्वार्ध के व्यवहार की वजह से उसे इनका साथ नहीं मिल पाता या वे लेना ही नहीं चाहते हैं। गुमसुम रहते हुए अपना जीवन गुजारते हैं और एकाकीपन का शिकार हो जाते हैं। देखा जाए तो एकाकीपन एक घुन की तरह है, जो उम्र को धीरे-धीरे खा जाता है । ऐसे लोग देखने में उम्र से अधिक नजर आते हैं ,उनमें चुस्ती फुर्ती भी कम हो जाती है चेहरा लटक जाता है चाल धीमी हो जाती है और जीने का जो आनंद उम्र के उत्तरार्ध में मिलना चाहिए उससे वंचित हो जाते हैं।
यदि जीने का आनंद लेना है तो व्यक्ति को उन्मुख होना ही चाहिए।
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