उस दिन न जाने क्यों दिमाग पर भूत चढ़ा था,
या यूं कहो कि दिमाग ही सड़क पर पड़ा था।
वह जो मेरी कविता पर जाती थी बलिहारी,
सूरत से बड़ी प्यारी और थी सबसे न्यारी।
जब भी मेरी कविता उसे फेसबुक पर दिखाई देती,
वह फोन करके तुरंत ही मुझे बधाई देती।
क्या बताएं जी हम तो उस पर लट्टू हो गए,
दिल में बुन्दी विचार मिलकर लड्डू हो गए।
तो उस दिन मैंने उसे कॉफी का निमंत्रण दिया
उसने उसे तुरंत ही सहर्ष स्वीकार किया।
पत्नी को मैंने आइडिया से भगाया,
अच्छी साड़ी लेने बाजार भिजवाया।
क्या बताऊँ मैंने कॉफी पर उसे बुलाया,
मुझे क्या पता पति भी है आया।
लेकिन दुनिया मुझे यूं ही नहीं कहती होशियार,
मैं भी था ऐसी स्थिति के लिए बिल्कुल तैयार।
मैं दोनों को देखकर खुश हुआ ऐसा दिखाया,
पति को तीखी नजर से देख दोनों को बिठाया।
कॉफी बना कर मैंने कर दी उनको पेश,
मन में सोच रहा था थोड़ी देर में होगी मेरी ऐश।
मैं सुन रहा था प्रशंसा की मीठी मीठी बोली,
इधर मौका देख मैंने पति की कॉफी में डाली गोली।
उसने यह देख लिया और बोली यह क्या डाला,
मैंने कहा यह कॉफी का है स्पेशल मसाला।
लेकिन जैसे ही उसका पति बेहोश हुआ,
प्रेयसी नहीं अब उसका चंडी का भेष हुआ।
उस दिन उसने कर दी मेरी तबियत से अच्छी धुनाई,
अपनी बेचारी पत्नी से करवाई मैंने जगह-जगह सिकाई।
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