शुक्रवार, 2 दिसंबर 2022

एक कप कॉफ़ी दोस्ती की - लघुकथा



 कभी-कभी कोई बात होती है और नहीं भी होती।एक पक्ष को लगता है, कोई बात ऐसी थी तो दूसरे को लगता है कोई बात ऐसी थी ही नहीं। छोटी सी बात पर दोस्ती में दरार पड़ जाती है।


   राकेश का छोटी सी बात पर पड़ोसी सूरज से मनमुटाव हो गया था। बच्चों में झगड़ा हुआ और पड़ोसी ने बच्चे को चांटा मार दिया।कुछ अनर्गल वाक्यों का आदान प्रदान हुआ और रंजिश पैदा हो गई। एक दूसरे के घर आना- जाना बंद। घर से बाहर निकलते वक्त कभी आमना-सामना भी हो गया तो नज़र को घुमा देना नई प्रक्रिया हो गई थी।


  एक दिन अपनी धुन में ही राकेश ने पड़ोसी सूरज की डोर-बेल बजा दी।वे बाहर निकले और राकेश उनके साथ ही अंदर चला गया। थोड़ी देर चुपचाप बैठे रहे फिर सूरज ने पूछा- चाय पियोगे, राकेश ने कहा नहीं,पिछले माह से ही मैंने चाय पीना छोड़ दिया। फिर कहा चलो कॉफी पी जाए। 

 अक्सर देखा गया है कि जो लोग चाय नहीं पीते वे कॉफी के लिये ना नहीं कर पाते, राकेश ने भी ऐसा ही किया। थोड़ी देर कॉफी पीते रहे फिर राकेश ने ही बात शुरू की-अरे भाई उस दिन बच्चों के झगड़े में मैंने तुम्हारे बच्चे को चांटा मार दिया था, मुझे इस बात का अफसोस है ,लेकिन उसने भी तो मेरे बच्चे को धक्का मार कर गिरा दिया था,तो आवेश में मैंने ऐसा कर दिया।शायद मैंने गलत किया था।


 अब सूरज की बारी थी बोलने की। उसने कहा कि हां मेरे बच्चे को धक्का नहीं देना चाहिए था,तुम्हारे कहना सही है। चलो छोड़ो जो हो गया सो हो गया ।

 बस हो गई बोलचाल शुरू, सारे गिले- शिकवे कॉफी के कप पर दूर हो गये, दोस्ती बरकरार रही।


स्वरचित एवं मौलिक - सतीश गुप्ता पोरवाल ,जयपुर

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