साँझ ढली और मन महका,
सपनों ने ली अंगड़ाई।
मन को जब समझाया हमने,
तब आखों में नींद समाई।
जब जब सोचूं बात पिया की,
याद सताये बात पिया की ।
जब समझाऊं मन को अपने,
दिल हौले से फिर धड़का।
सांझ ढली और मन महका,
सपनों ने ली अंगड़ाई।
लिखना चाहूं प्रेम की पाती,
क्या लिखना है समझ न पाती।
कोई आकर मुझे समझाए,
कैसे होगी प्रेम की बरखा।
सांझ ढली और मन महका,
सपनों ने ली अंगड़ाई।
प्रेम की भाषा समझ न आये,
समझ न आये और उलझाये,
ओ मेघा अब तू ही आकर,
मुझको और उनको समझा।
सांझ ढली और मन महका,
सपनों ने ली अंगड़ाई।
मन को जब समझाया हमने,
तब आखों में नींद समाई।
सांझ ढली।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें