शुक्रवार, 16 दिसंबर 2022

भवसागर -- कविता

भवसागर में तैरना चाहता हूं तैर नहीं पाता,
पार उतरना चाहता हूं उतर नहीं पाता ।
करना चाहता हूं बहुत कुछ कर नहीं पाता,
कैसी यह बेबसी है समझ भी नहीं पाता।

लगता है जैसे किसी ने हाथों को बांध दिया हो 
किसी ने जैसे पैरों को जकड़  लिया हो।
आंखों पर जैसे काला चश्मा लगा दिया,
सभी ने मुझे बेबसी में उलझा दिया।

भँवर में फंसकर नहीं रहना चाहता हूं,
अब भवसागर को पार करना चाहता हूं।

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