शनिवार, 3 दिसंबर 2022

मुक्तक/शायरी

 क्यों करें हम यहां पर किसी की भी खिलाफत,

 जमाने में नहीं हमें किसी से भी अदावत।

  सच मान लो मेरा कहा मेरे दोस्तों,

 मेरी जिंदगी तो है बस तुम्हारी अमानत।


तुम्हारी याद आती है तो,

 वह मंजर याद आता है।

 वह मंजर याद आता है तो,

 हमको बहुत सताता है।


हम चिट्ठी दर चिट्ठी तुम्हें भेजते रहे ,

  जवाब देना तुम्हें नहीं गवारा क्या यही समझें।

 या फिर अपनी बिखरी लटों में अंगुली डालकर,

  धीरे-धीरे घुमाकर हमें देखना तुम्हारा इशारा समझें ।


सब्जा इतना कर दो इस जमाने में,

गिन्नीयां ही गिन्नीयां भरी हो जैसे खजाने में।

कहीं भी गमों के मानिंद सूखा नजर न आए

 इसी का तो हाथ होगा धरती को सजाने में।


कमबख्त आखिर कहूं तो किसे कहूं,

 दिन को, दिल को या किस्मत को कहूं।

  मेरे वश में तो कुछ भी नहीं,

  अब जो भी हो उसे ही सहूं।


दुनिया में आये हैं तो जीना ही पड़ेगा,

 मुसीबतों से दो चार तो होना ही पड़ेगा।

 दुनिया तुम्हें तरह-तरह के सबक सिखाएगी,

 और तुम्हें इम्तिहान तो देना ही पड़ेगा।


यह सच है कि जिंदगी इम्तिहान लेती है ,

किसी को पास किसी को फेल करती है।

 फेल होने वालों को तो दुख देती है,

और पास होने वालों के दुख हरती है।


आपाधापी की इस दुनिया में मची हुई रेलम पेल,

 कोई हो जाता 'पास' और कोई होता फेल।

 सिक्का तो उछाल ही दिया है,

 कौन जीतेगा यही किस्मत का खेल।

 

 अब नहीं रहा हमें दुनिया से कोई काम,

 अब चाहे गला रहे सूखा या पिला दे कोई जाम।

 कोई भी नगमा दिल को सुकून देता नहीं,

  मेरी जिंदगी तो है बस डूबती एक शाम।


 हौले हौले से मेरे दिल के करीब आकर बोलना, 

   दिल तुम्हारा चाहे न चाहे तुम मगर बोलना।


गुरु से गहन गुर ग्रहण करके,

 विद्यालय में विद्या से विचार करें।

विचार से विवेक से विश्लेषण करके,

  जीवन को जीवट जंजालों से मुक्त करें। ।


जीने का कोई उद्देश्य तो होना ही चाहिए,

 जिंदगी तो सादगी से ही जीनी चाहिए।

 विचारों में बनाए रखिए मौलिकता, 

 और जीवन में स्थिरता होनी ही चाहिए।

 

सपनों के पीछे भागना क्या मृगतृष्णा कहलायेगा ,

सपनों से दूर रहेगा तो मंजिल कैसे पायेगा।

 जिंदादिल होकर जो लक्ष्य की ओर बढ़ जायेगा,

 वही अंततः सपनों को सच कर पायेगा।


सुख चैन कहां सिधारे, 

मुख आभा कोऊ न निखारे।

मम उर माही तू ही बिराजे, 

नैन निहारे चरण तिहारे ।


गुम हो गई जो बागों में आती थी बहार, 

फूल चमन में मुरझा गए क्यों इस बार।

 दिल अब लगता नहीं जरा भी हमारा, 

   जब से उजड़ गया है हमारा यह दयार।


  सोच की मानिन्द सरल नहीं जीवन मानव का ,

 सफल,सुरक्षित जीवन जीने की होती है कामना।

  सफल हो जीवन यदि मैं,मेरा,हमारा छोड़कर,

  मानव के जीवन में समर्पण की हो भावना।


बीमार का हाल पूछने चले आते हैं ,

दिलासा कम देते ज्यादा डराते हैं। 

इस तरह से हाल पूछना तो कमतर है,

 बीमार को अपने हाल पर छोड़ना ही बेहतर है।


सर्द हवाओं और फर्द में रस्साकशी जारी है,

 कहना मुश्किल है कौन किस पर भारी है।

 सर्द हवाएं उष्ण हवाओं में बदल जायें,

  ऐसी ही हम करबद्ध विनती करते जायें।




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