मैं खुद अपना परिचय क्यों और कैसे दूँ,
जाने-माने और प्रसिद्ध में अपना नाम कैसे लूं।
अब क्या बताऊँ मैंने क्या-क्या किया,
अपने लिए नहीं दूसरों के लिए ही जिया।
कुछ लोग कहते हैं कि मैं इंसान तो नहीं ,
कुछ कहते हैं कि भगवान भी नहीं।
जब मैंने पूछा तो क्या मैं शैतान हूं,
तो बताया कि नहीं मैं शैतान भी नहीं।
न मैं ज़मीं हूं न आसमाँ हूं,
मैं नहीं जानता मैं कहां हूं।
कोई पुकार ले मुझे प्यार से,
तो समझ लो मैं वहां हूं ।
कभी मैं सोचता हूं अपनों के लिए,
कभी सोचता हूं परायों के लिए।
सच कहूं तो दिल दुखता है मेरा,
ज़माने से सतायों के लिए।
देखा जाए तो मैं तो मैं हूं,
हां थोड़ा सा विस्तृत हो जाऊं तो हम हूं ।
और ज्यादा फ़ैलूं तो मैं सब हूं,
यही मेरा परिचय और नहीं बस हूं।
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