आलस्य ही तो है जो मुझे रोक रहा है,
वरना मैं भी कुछ न कुछ तो लिखता।
और सभी कवियों की ही तरह,
मेरा भी दिल कुछ तो खिलता।
लिखना चाहूं मैं बहुत कुछ बातें,
कुछ इधर की कुछ उधर की।
जो हो चुका और जो ना हुआ,
लेकिन मेरी लेखनी का स्वभाव मुझसे नहीं मिलता।
यह आलस्य नाम की चिड़िया मेरी नहीं सुनती,
सच कहता हूं मैं भी चाहता हूं लिखना,
मैं भी चाहता हूं कवियों की श्रेणी में आना,
यदि नहीं चाहता तो क्यों अपना दिमाग घिसता।
प्रतिस्पर्धा का है यह जालिम जमाना,
देखा-देखी और लोग भी आलस्य करने लगे,
कहीं मैं आलसियों का सरताज न घोषित हो जाऊं,
इसीलिए कुछ लिखने की कर ली है धृष्टता।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें