शनिवार, 3 दिसंबर 2022

शब्द कुंद पड़ गये-' कविता

 शब्द कुंद पड़ गए ज़ुबान ने भी चुप रहना ठीक समझा


जब से आए हैं इस जगत में,

कहते ही जा रहे हैं,

 सुनने वाले सुन तो रहे हैं

 क्या सुन रहे हैं छुपाना ठीक समझा।


 कभी शब्दों की माला पिरो कर,

 कभी कविता के रूप में पेश किया,

 लेख लिख कर भी कोशिश की,

 कभी हास्य कविता से हंसाना ठीक समझा।


हम तो ठहरे गाय जैसे इंसान,

या यों  कहें कि दीया जैसे इंसान,

 जिस ने जैसा कहा वैसा हमनें किया,

  लेकिन लोगों ने हमें ठगना ठीक समझा।


 बेजार हो चुके हैं दुनिया की बातों से,

 कब तक सुनाएं कब तक समझाएं,

 अब तो शब्द कुंद पड़ गए,

 जुबान ने भी चुप रहना ठीक समझा।

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