गुरुवार, 15 दिसंबर 2022

मुरझाई सी आंखें-- कविता



न कभी सुख देखे न कभी दुख बीते,

  चले जा रहे हैं पथरीली राहों पर,

  असमंजसों के भंवर में घूम रही

जवानी,

 मुरझाई सी आंखें कह रही यही कहानी।


 सभी के दिल थे बहुत ही प्रफुल्लित,

  जब तुम्हारा अवतरण हुआ था यहां,

 अब लद गए वे दिन और रातें सुहानी,

 मुरझाई सी आंखें कह रही यही कहानी।  

 

  मां की आंखें देखती थीं अपने लाल को,

 पिता भी फूले नहीं समाते थे देखकर अपने लाल को,

 और तुम्हें सूझती है करने को हरदम नादानी,

 मुरझाई सी आंखें कह रही यही कहानी।


 जिंदगी के तूफानों से टकराकर जीर्ण शीर्ण हो गए,

 आंखों के समंदर में अब ज्वार आता नहीं,

 कभी तूने दिलाई  नहीं मात'पिता को मौजों की रवानी,

  मुरझाई सी आंखें कह रही यही कहानी।

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