शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2022

मुझे भी दो मेरा अधिकार--कविता


#मुझे भी दो मेरा अधिकार 

स्वरचित--

  सतीश गुप्ता 'पोरवाल'


 मुझे नहीं है तुम्हारी हर बात स्वीकार,

 तुम समझ नहीं पाते हो कहा बारम्बार।

 मैं भी कुछ कहना चाहता हूं तुमसे,

  कहने का मुझे भी दो मेरा अधिकार ।


 मैं नहीं चाहता आसमां की ऊंचाई नापना, 

 न चाहता हूं सागर की गहराई जांचना।

  लेकिन समझ लो जो मैं जानता हूं,

  दुनिया के दिलों में क्या है भावना।


तुम कहां हो और जमाना कहां है ,

तुम वहीं हो तुम जहां थे ।

 बीमार मानसिकता से ग्रस्त हो इतना,

  समझते हो जैसे खुद शहंशाह हो।


अब तो मेरा मौसम खुशगवार कर दो, 

 प्यार से प्यार का व्यापार कर दो।

 मेरा दिल जो सूना सूना सा है,

 उसमें अपना भरपूर प्यार भर दो।


 अब मेरे विपरीत विचारों को करो निराधार,

  जो नहीं किया अब तक कर दो इस बार।

 तुम्हें तुम्हारा अधिकार हो मुबारक,

 मुझे भी दो मेरा अधिकार ।

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