शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2022

कुछ टूट रहा हो जैसे--कविता


#कुछ टूट रहा हो जैसे कुछ छूट रहा हो 


स्वरचित--

  सतीश गुप्ता 'पोरवाल',जयपुर। 


मन में आते भावों को कोई रोक रहा, 

 सुषुप्त से दिल को कोई झकझोर रहा। 

 जीवन की खुशियों को जैसे कोई लूट रहा हो,

 कुछ टूट रहा हो जैसे कुछ छूट रहा हो।


  जीवन में खुशियां ही खुशियां मांगी,

  फिर यह गम कहां से आन पड़ा।

  कौन मेरी खुशियों में अवरोध बना है, 

  अभी तक यह न जान पड़ा।

  लगता है जैसे दिल के धन को कोई लूट रहा हो,

   कुछ टूट रहा हो जैसे कुछ छूट रहा हो।


 सरोवर में कमल कुंज देख मन खिलता था,

 मन मयूर तो जैसे नाच उठता था।

 अब तो जीवन में ऐसा ही लगता है,

 जीने को अब कुछ भी नहीं बचता है।    

 लगता है हर शख्स जैसे हम को लूट रहा हो , 

 कुछ टूट रहा हो जैसे कुछ छूट रहा हो।

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