गुरुवार, 13 अक्टूबर 2022

मुर्दों के शहर में रहता हूं-कविता


स्वरचित-

 सतीश गुप्ता'पोरवाल'


जो कहते हैं वह करते नहीं,

 जो करते हैं वह कहते नहीं।

 सुनते भी नहीं जो मैं कहता हूं,

  मैं मुर्दों के शहर में रहता हूं।

  दुनिया की धारा नदिया जैसी बहती है,

 कल कल की धुन के साथ कुछ कहती है।

 कुछ भले लोग हैं जो धारा के साथ बहते हैं ,

 पर यहां ऐसी प्रजाति है जो किसी की नहीं सुनते हैं। 


 ना संवेदना है ना दिल में दया है,

 जाने इनके मन में क्या भरा है।

  पाला जिसका भी पड़ जाता है इनसे 

   वही आदमी डरा डरा है ।


 दूसरों का बुरा इनको अच्छा लगता है,

  इनका अच्छा ही इनको अच्छा लगता है।

  अपने आप को भरपूर वयस्क समझते हैं,

 और सामने वाले को तो बच्चा ही समझते हैं। 


 अब तो नहीं मुझे किंचित भी संकोच, 

 नहीं मिलती इनकी किसी भले से सोच। 

 अब तो मैं स्पष्ट शब्दों में यही कहता हूं ,

  मैं मुर्दों के शहर में रहता हूं।

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