मंगलवार, 18 अक्टूबर 2022

पिंजरे का पंछी- कविता



 जब भी देखता हूं सामने खुला आसमान,

 मेरे भी दिल में उठता है एक तूफान।

 मिलेगी मुझे भी एक दिन तो मंजिल,  

 या धरे रहेंगे मेरे यूं ही अरमान।


  मेरे पंखों में भी है भरपूर जान,

 भर सकता हूं मैं भी ऊंची उड़ान।

 पर क्या करूं मुझे पिंजरे में कैद कर लिया,

  इंसानों ने मेरे अरमानों पर पानी फेर दिया।


  ए दुनिया के लोगों कुछ तो सोचो, 

   यूं ही मेरे पंखों को न नोचो ।

 अब  तुमने सुनकर मेरी फरियाद  

  मुझे कर ही दिया है आजाद।


  अब मैं खुले आसमान में भरुंगा उड़ान, 

 मेरा भी जीवन होगा उन्मुक्त और आसान।

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