#मानसरोवरकाव्यमंच
#दैनिककार्य
स्वरचित-
सतीश गुप्ता'पोरवाल,जयपुर।
कमी एक रह गई फिर कभी मुलाकात न हुई,
कहनी थी जो आखिरी वह बात न हुई।
हम तो बनाना चाहते थे उसीको सब कुछ,
लेकिन वह हमारी कायनात न हुई।
बागों में फूल खिले आसमाँ में बिजली चमकी,
हमने उस के आगमन का अंदेशा हुआ।
जो कुछ भी बिखरा बिखरा था हमारे बीच,
उसके जुड़ने की शुरुआत न हुई।
अब तो सांसे भी उखड़ने लगी हैं
आशायें सब उजड़ने लगी हैं
सूनी सी इन आखों में
आंसुओं की बरसात न हुई।
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