सोमवार, 10 अक्टूबर 2022

आंसुओं की बरसात न हुई-कविता

 #मानसरोवरकाव्यमंच 

#दैनिककार्य 


स्वरचित-

सतीश गुप्ता'पोरवाल,जयपुर। 


कमी एक रह गई फिर कभी मुलाकात न हुई,

 कहनी थी जो आखिरी वह बात न हुई। 

 हम तो बनाना चाहते थे उसीको सब कुछ,

 लेकिन वह हमारी कायनात न हुई। 


 बागों में फूल खिले आसमाँ में बिजली चमकी,

  हमने उस के आगमन का अंदेशा हुआ।

 जो कुछ भी बिखरा बिखरा था हमारे बीच,

 उसके जुड़ने की शुरुआत न हुई।


 अब तो सांसे  भी उखड़ने लगी हैं 

 आशायें सब उजड़ने लगी हैं 

 सूनी सी इन आखों में 

आंसुओं की बरसात न हुई।

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