स्वरचित-
सतीश गुप्ता 'पोरवाल'
सागर की गहराई जैसा दुखों का अंबार है।
या कहिए कि हिमालय जैसा दुखों का पहाड़ है।
बड़ी मुश्किल से मिलती है खुशियां इस जमाने में।
खोना नहीं , खुशियां संभाल कर रखना।
मानव मन की आशाएं आसमां तक पहुंचती हैं ।
मन ही मन बड़े बड़े ख्वाब बुनती हैं।
ये ख्वाब कभी तो पूरे हो सकते हैं।
इन ख्वाबों को संभाल कर रखना।
बड़े महीन और नाजुक होते हैं रिश्ते।
जरा जरा सी बात पर बिगड़ जाते हैं रिश्ते।
थोड़ा गम खा लो थोड़े आंसू पी लो।
लेकिन इन रिश्तों को संभाल कर रखना।
आपस ही आपस में बातें हजार होंगी।
कुछ अच्छी और कुछ नागवार होंगी।
यह जबान ही तो है जो मिठास घोल सकती है।
इस जबान को संभाल कर रखना।
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