शनिवार, 15 अक्टूबर 2022

जिंदगी और आईना -- कविता


 #स्वरचित --

 सतीश गुप्ता 'पोरवाल' ,जयपुर। 


सोच समझ कर कोई नहीं आता इस दुनिया में,

 लाया जाता है या कहें कि बुलाया जाता है।

 क्या है और क्यों है इस दुनिया में, 

 सोचे तो भी समझ नहीं पाता है।


 जो कुछ उसे सिखाया जाता है ,

  वह वही सीखता जाता है।

 सीढ़ी दर सीढ़ी ऊपर चढ़ता जाता है, 

    उम्र की राह में कदम आगे बढ़ाता है।


  कुछ अजीब सी कहानी कहती है, 

 यह दुनिया वैसे भी नहीं जैसी लगती है। 

  नाजुक से मसले सामने आ जाते हैं, 

 दिल और दिमाग को उलझा जाते हैं। 


 रिश्ते नाते एक धुरी पर टिके हुए हैं, 

कुछ कम कुछ ज्यादा तुले हुए हैं। 

 कहीं-कहीं उलझन में उलझ जाता है, 

उलझ कर मन को उलझा जाता है। 


अब तो बस एक ही विचार मन में आता है, 

 आकर बार-बार वही दोहराता है।

 अपना पराया होकर कहीं रुठ न जाए, 

 जिंदगी आईने की तरह टूट न जाए।

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