शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

अकेले ही सफर करना है- कविता

 

स्वरचित -सतीश गुप्ता 'पोरवाल' जयपुर। 


 दुनिया में चाहे कोई साथ दे ना दे, 

 किसी भी स्थिति में नहीं घबराना है। 

 अकेले थे अकेले हैं और ,

 अकेले ही सफर करना है ।

  कोई सोचता है कोई नहीं सोचता, 

  सोच सोच में फर्क होता है।

   पूछ लो गर किसी से कैसा है,

  किसी को अच्छा और किसी को बुरा लगता है।

  जमाने की बातें है जैसे भूल भुलय्यां,

  अच्छा भला इंसान भी घूम जाता है। 

   दिमाग हो जाता है घनचक्कर , 

    करना क्या है समझ नहीं पाता है। 

 सोच समझकर यदि फैसला किया है,

 चल चला चल यही मंत्र काम आएगा।

 सही समय पर सही दिशा में चलने वाला, 

 निश्चित ही दुनिया में नाम कमाएगा। 

 सोच समझकर जो फैसले पर चल दिया है,

  तो तुमने सही में सही जीवन जिया है। 

 अब तो बस आनंदित हो मौज करना है,

 अकेले थे अकेले हैं और अकेले ही सफर करना है।

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