दीपक जलाओ , दीपक जलाओ,
एक नहीं अनेक जलाओ।
पूर्ण नहीं तो कुछ तो,
आसपास उजियारा फैलाओ।
बेशक दीपक तले अंधेरा होता है,
लेकिन यह औरों के लिए ही तो जलता है।
जलता तो है खुद ही
रोशनी औरों को देता है ।
मानव मात्र को भी,
ऐसा ही समझना होगा।
जैसे दिए से दिल में,
प्रेम की है बाती है,
वैसे ही लोगों को प्रेम की बात
क्यों नहीं सुहाती है।
कर लें हम भी यही निश्चय,
स्वयं को आलोकित करके,
अन्य को आलोकित करेंगे।
सारी दुनियां को प्रेम से भरेंगे।
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