गुरुवार, 27 अक्टूबर 2022

अंतरात्मा से जो आवाज -- कविता

 अंतरात्मा से जो आवाज उठती है सुनता हूं मैं भी।

 स्वरचित-

  सतीश गुप्ता 'पोरवाल'


 अपनी सोच विशाल रखता हूं मैं।

अपने प्रश्नों को संभाल रखता हूं मैं। 

 मेरी सोच से कोई सहमत हो या ना हो।

  अपनी सोच कमाल रखता हूं मैं। 


 किसी की आशाएं तार तार हो जाती हैं।

 यूं समझिए कि बेकार हो जाती हैं। 

 नहीं हो सकती हैं कभी भी पूरी।

 जब आशाएं बेशुमार हो जाती हैं। 


 खोजता हूं मैं कभी ऊंचे पहाड़ों में।

  कभी जमीन पर भी तलाशता हूं मैं भी। 

  कभी समंदर में गोते लगाकर।

  बहुमूल्य मोती चुनता हूं मैं भी।


  व्यर्थ की बातों में  कभी नहीं उलझता।

  सही-सही के लिए सिर को धुनता  हूं मैं भी।

 जीवन के रंगीन धागों से ख्वाबों की चादर बुनता हूं मैं भी। 

 अंतरात्मा से जो आवाज उठती  है सुनता हूं मैं भी।

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