स्वरचित --
सतीश गुप्ता 'पोरवाल'
इश्क में वादे तो हजार किए ,
मेरे दिल के गुल गुलजार किए,
पर मेरी चाहत नजरअंदाज करके,
वादे नीलाम सरे बाजार किए।
तुझसे मिलने को तरसता था मैं,
जार जार इंतजार करता था मैं।
ए बेवफा तुम्हारा सितम तो देखो,
वादाखिलाफी के दौर बार-बार किए।
आसमा की ओर टकटकी लगाए रहता,
अब अक्सर नहीं होश में मैं रहता।
पर तूने मेरे दिन पतझड़ जैसे
और खुद के तो बहार किए ।
मेरी तो जो हालत होनी थी हो ली,
लगता हूं जैसे बिना कहार के हो डोली।
तूने तो अपने दिन खुशगवार किए,
मेरे ही दिन क्यों सूने त्यौहार किए।
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