बुधवार, 19 अक्टूबर 2022

तारीख खुद को फिर दोहराती है

 तारीख खुद को फिर दोहराती है। 


सीने में तूफान और आंखों में आंसुओं का सैलाब,

तुम्हारे उत्पीड़न की कहानी सुनाती है। 

 जो करेगा ऐसा उसे मिलेगा वैसा ही 

 नियति तो हमें यही बताती है।


 पूनम की रात में चांदनी में नहाते हो, 

  फिर अमावस्या तक मलीन हो जाते हो।

  ना सताओ किसी को किसी भी तरह,

 क्या तुम्हें खुद इस तरह करनी सुहाती है।


 समय का चक्र चलता ही रहता है,

  नियति किसी के रोके कहां रुकती है।

 घड़ी की सुई हो या कर्मों की सजा,

  तारीख खुद को फिर दोहराती है।

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